भैया -- तुम बिन कैसी दीवाली !!!
थे साथ सभी रिश्ते - नाते ,
पर बिन तेरे , था मेरा घर खाली ....
रह गई मिठाई धरी हुई,
बस सजी हुई पूजा की थाली ...
भैया -- तुम बिन कैसी दीवाली !!!
ना रॉ केट आसमान में पहुंचे ,
ना बुलेट डराते थे मम्मी को ...
अनार , फुलझड़ी की रौशनी में ,
दिख जाती - "आँखों की लाली" ...
भैया -- तुम बिन कैसी दीवाली !!!
थे मिले सभी से हंस कर हम , ( गुरु दरबार में )
बिछडे संगी , छूटे साथी .. ( gudiya di , deepak bhaiya , vishal , shubham , vaishali, vidushi , raja, BK Singh sir , Pushpa aunty )
यूँ तो हँसी - ठहाके बहुत हुए ,
पर नहीं सुनी -- " तेरी हँसी " और ना ही --- "तेरी ताली " ..
भैया -- तुम बिन कैसी दीवाली !!!
तेरे हिस्से के भी दिए , माँ निकाले बैठी थी ,
जैसे तेरे आने की अब भी, एक आस जगाये रक्खी थी ..
फिर मायूसी से उसने , सब दिए जलाये एक एक कर के ,
हमको देकर बोली - " जा तू ही उजियारा कर दे " ..
भैया -- तुम बिन कैसी दीवाली !!!
घर तो उजियारा कर दी मैं,
मन उसका न उजाला पाई थी ...
दीवाली के "कजरौटे" से काजल की वो इक धार,
जो माँ तेरी आँखों तक पहुंचा ना पाई थी ...
भैया -- तुम बिन कैसी दीवाली !!!
पूजा बीती जैसे - तैसे , सब खाने को थे बैठे जब ...
बच गई थी पूडी की गोली, और कड़ाही में भी घी .. ( हमेशा तुम खूब सारी पूड़ियाँ खाते थे ... याद है)
कुछ छीटे तेल के पड़ गए थे , माँ के बाएँ हाथ पर,
शायद कुछ बूँदें " ममता के आंसू की " , जा मिली थी कड़ाही के -- गरम तेल में ..
भैया -- तुम बिन कैसी दीवाली !!!
पापा भी सब देख रहे थे, पर बोलना उन्हें भी ना आया,
हमने बोला " घर से ज्यादा" सँघ " यारों का " तुमको भाया ...
तभी सिसक रज़ाई में --- माँ बोली :
" जाने मेरे बेटे ने आज क्या खाया " ... ( thats all she was worried abt )
भैया -- तुम बिन कैसी दीवाली !!!
गर लिख पाती मेरे जैसा,
तो पंख लगा के उड़ आती,
तेरे पास लिए खाने की थाली,
और कहती, लेकर अश्रु , "मातृत्व - विकल" आँखों से ...
" बेटा ---- तुम बिन कैसी दीवाली " !!!!
" तुम बिन कैसी दीवाली " !!!!