तूफ़ान बाहर भी था ...
तूफ़ान अन्दर भी !!!!
कुछ शोर बाहर का था ...
कई कशमकश , मेरे मन के अन्दर भी !!!!
अन्धेरा --- बाहर भी पसरा हुआ था ..
वही था मेरे मन के अन्दर भी !!!!
सपनों में अविश्वास गहराया था ..
अब था वो इरादों में भी !!!!
सूनसान बाहर से था ...
सन्नाटा मेरे ज़ीवन में भी !!!!
कुछ पिघतला बाहर भी था ..
मैं घुलता रहा, अन्दर भी !!!
बरखा बाहर भी होती थी ..
थीं कुछ बूँदें मेरी आँखों में भी !!!
आवाज़ आई थी ,जोर से, कुछ " कांच - सा " टूटने की ........
तबाही बाहर भी थी ...
कुछ बिखरा - सा , मेरे अन्दर भी !!!! (heart )
दोज़ख ( hell ) के मन्ज़र "आप ही" लिखता रहा ... ....
" ख़ुदा " , बाहर तो नहीं था ..
न ही था, " वो " , मेरे अन्दर भी !!!!